Tuesday, November 17, 2015


न्यायपालिका भी लोगों के सवालों के दायरे में हो

“I am bound to obey his (judge) judgment, but I am not bound to respect it.”
-Dr. B. R. Ambedkar (Architect of Indian constitution)

जस्टिस अकोदिया से लेकर जस्टिस काटजू जैसे लोगों ने कई बार न्यायाधीशों द्वारा किए जा रहें भ्रष्टाचार के बारे में जिक्र किया है. लेकिन आज जिस बात की और मैं आप लोगों का ध्यान दिलाना चाहता हूं वो आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं है यह उससे भी गंभीर है यह है भ्रष्ट मानसिकता.

करिया मुंडा संसदीय समिति ने न्यायपालिका के बारे में स्पष्ट रूप से कहा था कि, “Their judgments very often betray a mindset more useful to the governing class than the servile class.'' साथ ही कहा कि ``Judiciary is neither sympathetic nor unbiased to the cause of backward classes''

क्या यह सच है? और अगर यह सच है तो हमें इस बात की जांच करनी होगी, कहीं बाबासाहब डॉ. आंबेडकर के संविधान का अर्थ निकालने का काम हमने मनु के पुजारियों को तो नहीं दिया हैँ? यह शक और गहरा तब हो जाता है जब इसी रिपोर्ट के अनुसार यह बात सामने आती है, कि 1 मई 1998 तक 481 हाईकोर्ट के न्यायाधीशों में सिर्फ 15 शेड्यूल कास्ट और 5 शेड्यूल ट्राईब न्यायाधीश थें और सुप्रीम कोर्ट में कोई भी न्यायाधीश इस कम्युनिटी से नहीं थें. आज भी केमोबेश यही परिस्थिति है और आज भी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लगभग 90 प्रतिशत न्यायाधीश 15 प्रतिशत उच्चजाति के है.
  
क्या न्यायव्यवस्था का यह झुकाव जातिवादी है?
अलग-अलग समय पर ओबीसी एससी- आदिवासी समाज से संबंधित मुददों पर न्यायपालिका ने जो निर्णय दिएं अगर हम उन्हें देखें तो न्यायपालिका का जातिवादी झुकाव स्पष्ट होता है जो मुंडा संसदीय समिति ने कहा था. 

1992 मंडल कमीशन-
ओबीसी आरक्षण के खिलाफ दायर याचिकाओं पर निर्णय सुनातें हुएं सुप्रीम कोर्ट ने 3 फैसले सुनाएं पहला कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से ज्यादा ना हो जिसकी वजह से 54 प्रतिशत ओबीसीको 27 प्रतिशत ही आरक्षण मिल पाया. दूसरा ओबीसी में जो क्रिमी लेयर है उन्हें आरक्षण ना दिया जाएं, यहां गौर करनेवाली बात यह है कि न्यायपालिका ने यहां आर्थिक आधार लाया जिसे संविधान निर्माता नकार चुकें है. तीसरा फैसला यह था कि एससी-एसटी को प्रमोशन में मिलनेवाला आरक्षण असंवैधानिक है और इसे 5 साल के अंदर समाप्त किया जाना चाहिएं. हालांकि बात तो ओबीसी के आरक्षण की थी और एससी-एसटी का कोई मुद्दा ही नहीं था. फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने इसे विवाद का मुद्दा बनाया. बाद में 77 वा संविधान संशोधन कर प्रमोशन में आरक्षण फिर से लागू किया गया. इसे भी निरस्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा कई निर्णय सुनाएं गएं जो निम्नलिखित है. 
  
R.K. Sabrawal Vs. Union of India
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि प्रमोशन में आरक्षण के जरिएं प्राप्त रिक्त जगहों में से 50 प्रतिशत से ज्यादा प्रमोशन नहीं दिए जा सकतें.

Virpal Singh Vs  Union of India
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 16(4) सिर्फ एनैब्लिंग प्रोविजन है. सवाल यह है कि 16(4) जिसकी वजहसे नौकरियों में आरक्षण मिलता है और जो बुनियादी अधिकार है उसे एनैब्लिंग प्रोविजन क्यों कहा गया? ऐसा करना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है.  

M. Nagraj Vs Union of India
इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रमोशन में आरक्षण को लागू करने का निर्णय राज्य के स्वविवेक पर होगा वह अलग-अलग समुदायों के पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर इसका निर्णय लें. इसका सीधा मतलब था कि आरक्षित कैटेगरी के लोगों को मिलनेवाले प्रमोशन में आरक्षण पर बहस की जगह छोड़ दी गई. ऐसे कई उदाहरण है जिसकी वजह से मुंडा कमिटी को न्यायपालिका का जातिवादी झुकाव नजर आया. 

ओबीसी-एससी-एसटी समाज की भागीदारी न्यायपालिका में क्यों नहीं?
भारतीय न्यायपालिका बिना सिर की है. यहां किसी का किसी पर कोई नियंत्रण नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का हाई कोर्ट पर कोई नियंत्रण नहीं, मुख्य न्यायाधीशों का बाकी न्यायाधीशों पर कोई नियंत्रण नहीं, हां कार्यविभाजन जरूर है, अगर कोई शिकायत करें तो इनकी जांच करने के लिए कोई एजेंसी नहीं केवल महाभियोग हो सकता है जो एक क्लिष्ट प्रक्रिया है.  
संविधान के आर्टिकल 124 (1) और 217 (2) के अनुसार राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीश चुनने का अधिकार है, और आर्टिकल 74 के अनुसार राष्ट्रपति यह काम कैबिनेट की सलाह से करेंगे. लेकिन 80 के दशक में जब बड़े पैमाने पर ओबीसी कैबिनेट में आने लगें मुख्यमंत्री बनने लगें तब यह निश्चित हो गया कि अब सिर्फ उच्चजाति के लोग ही न्यायाधीश नहीं बन सकतें इसके चलते 1980 में एस पी गुप्ता बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनातें हुएं कहा कि न्यायाधीशोंकी नियुक्ति राष्ट्रपति सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा बनायें गए कोलेजियम की सलाह से करेंगे. इसके बाद 1993 में आल इंडिया जजेस ऑन रेकॉर्ड बनाम भारत सरकार केस के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कोलेजियम के निर्णय को मानने के लिए राष्ट्रपति को बाध्य कर दिया. यह दुनिया में एकमात्र उदाहरण है जहां न्यायाधीशों कि नियुक्ति न्यायाधीश करतें है. इसके चलतें सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सिर्फ एक जाति के ही नहीं, एक ही परिवार के भी बनने लगें.   
इसीलिए मुंडा कमिटी ने सिफारिश की कि इन बिना सिर वाले न्यायपालिका को सिर दिया जाएं और नैशनल जुडिशिअल कमिशन बनाया जाएं जिसमें ओबीसी, एससी और एसटी का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाएं. ऑल इंडिया जुडिशिअल सर्विस के तहत न्यायाधीशों कि नियुक्ति की जाएं और न्यायपालिका को जवाबदेह बनाया जाएं.

अंत में.....
क्या मनुस्मृति की परंपरा आज भी चलाने की कोशिश जारी है.
राजा न्याय करने में असक्षम हो तो विद्वान ब्राह्मण को न्यायाधीश बनाया जाना चाहिएं, और वो जन्म से ब्राह्मण होना चाहिए (अगर विद्वान ब्राह्मण ना मिलें तो) राजा ग़लती से भी शूद्र को राजा ना बनाएं नहीं तो उसका राजपाठ नष्ट हो जाएगा. (मनुस्मृति, अध्याय-8)

हमें सोचना पड़ेगा दोस्तों क्योंकि आज भी मानवता के सबसे बड़े खलनायक मनु की मुर्ति राजस्थान हाईकोर्ट के बाहर लगी है. यह ब्राह्मण न्यायाधीश खुले आम आरक्षण का विरोध कर रहें है और पिछले महीने फिर से सुप्रीम कोर्ट ने नैशनल जुड़िशिअल कमीशन के प्रस्ताव को असंवैधानिक बताकर कोलेजियम को जारी रखने की बात की है.   

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