हमारे कुछ वामपंथी साथियों का कहना है कि जनमत के दबाव और बेरोजगारी के चलते पश्चिम बंगाल में औद्योगीकरण अनिवार्य हो गया था , यहीं कारण हैं कि नंदीग्राम और सिंगूर जैसी घटनाएं हुई और पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे की हालत खराब हुई। आगे जोड़ते है कि वामपंथ में जो ब्राम्हणवाद आया यह भी 10-12 साल पुरानी बात है, इससे पहले वामपंथ में ब्राम्हणवाद नहीं था। लेकिन क्या ये सच है कि इससे पहले ज्योति बसु के समय में ऐसी स्थितियां नहीं थी? 2008 में सिंगूर और नंदीग्राम में एस सी, एस टी, ओबीसी और मुस्लिमों को मारा गया उस समय बुद्ददेव मुख्यमंत्री थे (आंकड़े उपलब्ध है)।ऐसे ही 31 जनवरी 1978 को जब ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री थे ,उस वक्त मारिचझंपी में दलितों से उनकी जमीन छीन ली गई थी और विरोध करने पर 36 दलितों को वामपंथी सरकार द्वारा गोली मार दी गई थी। आज भी वहां के दलित इस दिन को ब्लैक डे के रूप में याद करते हैं।लैंड रिफार्म की बड़ी बड़ी बातें तो वामपंथी करते है लेकिन लैंड रिफार्म (ऑपरेशन बर्गा) की असलियत को हमेशा छुपाए रखते हैं। अगर हम 1971 के पहले की परिस्थितियों को देखते है तो उस वक्त पश्चिम बंगाल में कुल 42.57 प्रतिशत एस सी, 48.85 प्रतिशत एस टी और 19.45 प्रतिशत अन्य लोग भूमिहीन थे। इसके बाद वामपंथी सरकार ने अपना ऑपरेशन बर्गा चलाया नतीजा क्या हुआ कि 1991 में बंगाल में 41.12 प्रतिशत एस सी, 50.7 एस टी और 15.55 प्रतिशत अन्य लोग भूमिहीन थे। इसका मतलब परिस्थितियों में कुछ खास बदलाव नहीं आया इसके विपरीत भूमिहीन आदिवासीयों की संख्या बढ़ गई। लेकिन अच्छी बात ये है कि ढ़ोग का लवादा उतारकर वामपंथियों ने मान लिया की पं बंगाल सरकार में ब्राम्हणवाद हावी है।

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