Wednesday, December 8, 2010

आरएसएस की सोच के पीछे कारण क्या है???

दंगे होते थे, होते हैं और होते रहेंगे!!

हाल ही में मेरे एक परिचित ने हिंदु-मुस्लिम संबंधों पर एक चर्चा में कहा कि दंगे होते थे, होते हैं और होते रहेंगे। मेरे यह मित्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक है और दंगों को लेकर उनके ये विचार  सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि रा. स्व. संघ यह दावा करता है कि वह गांधी के आदर्शों पर चलने वाला संगठन है। जहां तक मेरे उस मित्र का सवाल है मैं उसे व्यक्तिगत रुप से जानता हूं। भले ही वह हिंदुत्व और रा. स्व. संघ का कट्टर समर्थक है, लेकिन दंगों को लेकर उसके विचार ऐसे होंगे यह इससे पहले ना तो उसके व्यवहार से लगा ना बातों से, क्या ये विचार उसके खुद के थे ? या फिर जिस संघ परिवार के संस्कारों में वह पला बढ़ा वहां से यह विचार उसमें डाले गए। अगर ये विचार उसके व्यक्तिगत भी हों, फिर भी ये देशद्रोही विचार उसमें कहां से आए, इस सवाल का जवाब ढूंढ़ना मुझे महत्वपूर्ण लगा।
इसी दिशा में सोचते हुए मुझे गोलवलकर गुरुजी के विचार पढ़ने का मौका मिला, जो रा. स्व. संघ के दूसरे सरसंघचालक थे और उन्होंने ही अपने साहित्य और भाषणों द्वारा रा. स्व. संघ की भूमिका रखी थी। उनके विचार पढ़कर मैं मेरे मित्र के दंगों संबंधी विचारों के मूल में पहुंचा। गोलवलकर गुरुजी द्वारा लिखित वी आर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड और बंच ऑफ थॉट्स में ऐसी अनेक बातें मिलती हैं जो आपको मेरे मित्र के विचारों की जड़ तक पहुंचने में मददगार होंगी। गौरतलब है कि वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइन्ड किताब को उस समय स्वयंसेवकों के बाइबल का दर्जा हासिल था। मैं इस किताब से कुछ पंक्तिया नीचे उद्धरित कर रहा हूं।
हिटलर ने लाखों ज्यू लोगों की हत्या की वह योग्य थी, हम भी उसे दोहराएंगे-------- जर्मनी ने सिद्ध किया कि, भिन्न वंश व संस्कृति के लोग एक साथ नही रह सकते। उनमें एकरूपता असंभव है हिंदूस्थान ने जर्मनी से यह पाठ सीखना ही चाहिए, तथा हिंदू उदार है, हिंदूस्थान में गैरहिंदुओं को रहने की मंजूरी दी जाएगी, लेकिन इस शर्त पर कि वे हिंदुत्व के समक्ष समर्पण कर दें, हिंदुत्व का गुणगान करने के अलावा वे कुछ भी ना करें, उनकी खुद की अलग पहचान ना हो, वे खुद के लिए विशेषाधिकार ना मांगे, नागरिकता के अधिकार भी ना मांगे तभी गैरहिंदूओं को इस देश में रहने की मंजूरी दी जाएगी। ...............  वे (मुसलमान) लोग हमारे देश पर आक्रमण करते आए है और पिछले 1200 वर्षों से वे खुद को विजेता व शासकों के रुप में अनुभव कर रहे है.................. हिंदूओं के प्रति उनका विरोध इतना तीव्र है कि हम मंदिरों की पूजा करते है तो वे मंदिरों को अपवित्र करते है। हम स्त्रियों को पवित्र मातृमूर्ति के रूप में पूजते है तो उन्हे उससे बलात्कार करने की इच्छा होती है।
-वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाईन्ड (1939)
गुरुजी अपनी दूसरी किताब बन्च ऑफ थॉट्स में भी कुछ ऐसेही विचार प्रकट करते है.
हिंदू- मुस्लिम भाई भाई कहने वाले भय से ऐसा कहते हैं। हिंदू-मुस्लिम-ईसाई इनको एकत्रित करना बंदर का सिर, हाथी का धड़ और बैल के पैर एकत्र करने जैसा है।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-11)
हिंदू राष्ट्र का मैं पुत्र हूं ऐसा कहने से भ्रष्टाचार तथा सभी स्वार्थ नष्ट हो जाएंगे.........मुसलमान पंथ व मुसलमान समाज के साथ हमने हमेशा से ही भलाई का व्यवहार किया है, फलस्वरूप हमारे पवित्र स्थल भ्रष्ट हो गए।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-17)
हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है, धर्मांतरण राष्ट्रांतरण है। केवल हिंदू समाज इस मातृभूमि का पुत्र है।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-9)        
क्या गुजरात में हुए मुस्लिम वंश-संहार के बीज गुरुजी के इन विचारों में नहीं झलकते ? आखिर क्यों गुरुजी समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता जैसे लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों को नहीं मानना चाहते?  आखिर क्यों गुरुजी धर्म को राष्ट्र के बराबर दर्जा देना चाहते है? क्या धर्मनिष्ठा ही राष्ट्रनिष्ठा है यह बतानेवाले लोग राष्ट्रद्रोही नहीं है ? इन सवालों के जवाब गोलवलकर गुरुजी के भावी समाज की संकल्पना में मिलते हैं। वे लिखते हैं-
आजकल चातुर्वर्ण व्यवस्था को परकीय वादों व समानता के चश्मे से देखा जाता है और इसे नष्ट करने की बात कही जाती है। चातुर्वर्ण नष्ट करना शरीर के अंग को काटने जैसा है।                           
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-8)
जातियां प्राचीन समय में थी और हजारों वर्षों के गौरवपूर्ण काल में वे बनी रहीं। जाति-व्यवस्था की वजह से सामाजिक प्रगति के अवरुद्ध होने का एक भी उदाहरण नहीं है। (लाला हरदयाल ने गोलवलकर गुरुजी को एक घटना बताई थी। वह इस पुस्तक में बताई गई है।) दक्षिण भारत में एक अंग्रेज अधिकारी का सहायक एक नायडू जाति का व्यक्ति था। एक दिन वह अंग्रेज अधिकारी अपने चपरासी के साथ जा रहा था और सामने से नायडू जाति का सहायक आ रहा था। जब वे मिले तो दोनों अधिकारियों ने एक दूसरे से हाथ मिलाकर स्वागत किया। ब्राह्मण चपरासी को देखते ही सहायक नायडू अधिकारी ने अपनी पगड़ी निकालकर उस चपरासी के कदमों पर अपना सिर रख दिया। अंग्रेज अधिकारी ने आश्चर्य से नायडू से इसका कारण पूछा तो जवाब में उसने कहा कि यह चपरासी  ब्राह्मण जाति का है, यह वर्ग युगों से आदरणीय समझा जाता है इसलिए इनके सामने माथा टेकना मैं अपना कर्तव्य समझता हूं। (इसके बाद गुरुजी अंग्रेजों द्वारा ब्राह्मणों को स्थान भ्रष्ट करने का दुख व्यक्त करते हुए ब्राह्मणों का खोया हुआ वैभव पुनः प्राप्त करने की कोशिश में खो जाते हैं।)
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-8)
गोलवलकर गुरुजी ने यह किस्सा बताकर रा. स्व. संघ की स्थापना का उद्देश स्पष्ट किया है। रा. स्व. संघ ने जिसे धर्म को पुनरुज्जीवन कहा है वह इसी जातिव्यवस्था व वर्णव्यवस्था का पुनरुज्जीवन है। चातुर्वर्ण व जातिव्यवस्था को पुनःस्थापित करने के लिए उतावले यह गुरुजी जब यह कहते हैं कि जाति-व्यवस्था की वजह से सामाजिक प्रगति के अवरुद्ध होने का एक भी उदाहरण नहीं है तो सवाल उठता है कि क्या गुरुजी के लिए समाज केवल ब्राह्मण व उच्चवर्ण के लोग ही हैं, जिन्होने इस जातिव्यवस्था का फायदा उठाया? क्या गुरुजी इस देश के 85 प्रतिशत शूद्र व अतिशूद्र समाज के लोगों को अपना समाज नहीं मानते, जिनके साथ पिछले ढ़ाई हजार वर्षों से इस जातिव्यवस्था के तहत ये ब्राह्मणवादी लोग जानवरों जैसा सुलूक करते आए हैं। इसी ब्राह्मणवाद को पुनःस्थापित करने के लिए इस देश के बहुजनसमाज का ध्यान उनके मूल समस्याओं से व असली ब्राह्मणवादी दुश्मनों से हटाना जरुरी हो जाता है। इसी के तहत रा. स्व. संघ व उनके परिवार के लोग इस देश के मूलनिवासी मुस्लिमों के खिलाफ बहुजन हिंदुओं को भड़काते हैं लेकिन गुरुजी व उनका संघ इस बहुजन हिंदु समाज को अपना समाज नहीं मानता, यह भी हमें उनके आगे दिए गए विचारों से ध्यान में आता है।
अन्न, वस्त्र, आश्रय और दवाईयां, ये सभी चीजें गौण हैं। हमारे देश के नेताओं की नजर भौतिक सुख सुविधाओं के पार नही जाती। जीवनस्तर बढ़ाने की घोषणा की जा रही है। मनुष्य का लालच बढ़ाना और उसके तृप्ति के लिए सुख व उपभोगों के साधनों में वृद्धि करना यह इस घोषणा का अर्थ है।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-4)
क्या गुरुजी नहीं जानते कि भूखे पेट कितने दिन अध्यात्म जिया जा सकता है ? ये मूलभूत जरुरतें उन्हें इसलिए महत्वपूर्ण नहीं लगती क्योंकि वह जिस वर्ग में जन्मे थे और जिस वर्ग के लिए कार्य करना चाहते थे, उस तथाकथित उच्चवर्ण के लोगों की सभी जरुरतें पूरी हो चुकी हैं। और बचे हुए तथाकथित शूद्र समाज का ध्यान इन समस्याओं पर ना जाए और सारी मलाई सवर्ण चाट जाएं इसलिए उन्हें धर्म, नसीब, पुनर्जन्म के मायाजाल में फंसाकर उनके दिमाग को कुंठित किया जा रहा है। इसके चलते बहुजन समाज को बहकाने  का एजेंडा भी गोलवलकर दे गए। वे कहते हैं,
पुरानी चीजों को फेंक देने की मानसिकता ठीक नहीं है। बुद्धि से विचार करना अच्छा नहीं है, इसे बुद्धि का गुलाम कहा जाता है।
 -बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-19)
बुद्धिवाद से मनुष्य नरमांसभक्षक हो जाएगा
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-8)
आधुनिक काल अज्ञान का काल है। जो लोग हिंदू-तत्वों को गूढ़ परलौकिक मानते हैं उन्हे गोलवलकर बंदरों की श्रेणी में रखते हैं। संगीत, नाटक, नृत्य, सिनेमा यह संस्कृति नहीं, विकृति है।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-3)
स्त्रिमूक्ति के आंदोलनों को गोलवलकर गुरुजी नापसंद करते हैं। वे कहते हैं- स्त्री को तू गुलाम है यह बताकर केवल झगड़े लगाए जा रहे हैं। जाति आधारित आरक्षण भी गोलवलकर गुरुजी को मान्य नहीं है।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-8)
वैसे तो यह स्पष्ट है कि बुद्धिवाद से दूर रहने की सलाह गुरुजी ने तथाकथित शूद्र व अतिशूद्र बहुजन समाज को दी है लेकिन कभी कभी के. सी. सुदर्शन जैसे सरसंघचालक भी पोथीनिष्ठ होकर इसका पालन करते हुए दिखते हैं। जहां तक स्त्री और स्त्री आंदोलनों की बात है तो इस ब्राह्मणवाद की संकल्पना में सभी वर्णों की स्त्रियों के हालात शूद्रों जैसे ही थे। न इन दोनों को पढ़ने का अधिकार था और न ही इंसान की तरह जीने का माहौल इनके लिए था। आज ब्राह्मण के घर की स्त्री हो या अतिशूद्र के घर की स्त्री वह पढ़ लिखकर आगे बढ़ी है तो केवल महात्मा फुले व सावित्रीबाई फुले की संघर्षपूर्ण क्रांति की बदौलत।
दूसरी ओर कभी कभी नरमांसभक्षक बनने से बचने के चक्कर में गोलवलकर भी बुद्धिवाद से दूर जाते हुए दिखते हैं। इसके उदाहरण भी हम उनके इस किताब में देख सकते हैं।
हमारे देश को स्वतंत्रता प्रयासों से नहीं मिली बल्कि दूसरे महायुद्ध में हुई मनुष्यहानि की वजह से अंग्रेज कमजोर हुए और उन्होने स्वयं ही भारत छोड़ दिया।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-13)
तिरंगा ध्वज प्रवाहपतित अवस्था व परानुकरण वृत्ति का निर्देशक है।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-14)
शहीदों को आदर्श नहीं माना जाए क्योंकि वे असफल होते हैं।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-16)
इन विचारों को पढ़कर ज्यादा आश्चर्यचकित होने की जरुरत नहीं है क्योंकि संघ और गोलवलकर गुरुजी के स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में क्या विचार थे, ये उनके व्यवहार से कई बार झलकता है।
उदाहरण के तौर पर, 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान मुंबई के ब्रिटिश गवर्नर ने रा. स्व. संघ को उत्तम चरित्र का प्रमाणपत्र देते हुए केंद्र सरकार को बताया कि गोलवलकर अतिशय दूरदर्शी, होशियार और सक्षम नेता हैं। उन्होंने रा. स्व. संघ को बड़ी चतुराई से इस आंदोलन से अलिप्त रखा।
जहां तक शहीदों की बात है तो सच यह है कि गांधीजी के हत्या के बाद संघ के लोगों ने कई जगहों पर मिठाई बांटी और दही-चावल खाया। संघ के लोगों के इन हरकतों के कारण लोगों ने उन्हें खूब प्रसाद भी दिया।
देखा जाए तो रा. स्व. संघ के संस्कारों में पले बढ़े भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी पर भी अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी संगठन ने दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन में आंदोलन के दौरान अंग्रेजों से मिल जाने का आरोप लगाया।
इस वक्त संगठन के नेता व वरिष्ट स्वतंत्रता सेनानी लीलाधर वाजपेयी ने कहा कि 1942 के आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने चले जाओ का नारा दिया। गांधीजी के इस आवाज से प्रेरित होकर मैंने कुछ युवाओं के साथ आगरा जिले के दो सरकारी इमारतों पर कांग्रेस का ध्वज फहराया। अटलबिहारी वाजपेयी व उनके बंधु प्रेमबिहारी वाजपेयी भी ध्वज फहराते वक्त हमारे साथ थे। हमारी यह कृति अहिंसक थी लेकिन ब्रिटिश पुलिस ने एक दीवार तोड़कर और एक इमारत को आग लगाकर इसका आरोप हमारे ऊपर लगाया, हमारे खिलाफ झूठे केस दर्ज किए गए। अटलबिहारी वाजपेयी और उनके बंधु ने ब्रिटिश न्यायाधीश के सामने माफीनामा लिखकर दिया। वे अंग्रेजों से मिल गए। जिसके चलते मुझे पांच वर्षों की कैद हूई। साथ ही उन्होने कहा कि वायसराय के विधिमंडल के सदस्य गिरिजा शंकर वाजपेयी के हस्तक्षेप से वाजपेयी व उनके बंधु इस मामले में बच गए।
दूसरों को देशभक्ति का पाठ पढ़ानेवाले रा. स्व. संघ जैसे  यह धर्म के ठेकेदार असलियत में हमारे देश के गद्दार  हैं। फिर गोलवलकर को राष्ट्रद्रोही क्यों ना कहा जाए ?
खैर, अब जरा गुरुजी के अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे पर भी गौर करते हैं। यह पढ़कर गुरुजी की बुद्धिवाद से दूर जाने की आग्रही भूमिका स्पष्ट होती है।
युद्ध होने चाहिएं, युद्ध से आलस्य, स्वार्थ, प्रांतवाद नष्ट होता है। दीर्घकाल तक चलने वाले युद्ध से ये फल निश्चित रूप से मिलते हैं। पाकिस्तान पर कब्जा करना चाहिए, पाकिस्तान पर अपना झंडा फहराना चाहिए। ऐसा करते वक्त यूएनओ की सूचनाओं की ओर बिलकुल ध्यान ना दें। यूएनओ एक ढोंग है।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-18)
अंतर्राष्ट्रीय और वैश्विक एकता ढोंगी कल्पना है।
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-15)
अंतर्राष्ट्रीय नीति में केवल नेपाल ही अपना मित्र हो सकता है.” (यह पढ़ने के पहले तक मुझे लगा कि के.सी. सुदर्शन ही पहले ऐसे सरसंघचालक है जो महाविचारी थे लेकिन मै गलत था)
-बन्च ऑफ थॉट्स (भाग-3)
यह हुई गुरुजी की बात। अब जरा रा. स्व. संघ के भगवान वि. दा. सावरकर के विचार भी देख लें। (वैसे इन्होंने भी वाजपेयी की तरह अंग्रेजों से माफी मांगी थी)। इन्हे मैं रा.स्व. संघ का भगवान इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मेरे उसी मित्र ने कहा था कि सावरकर उनके लिए प्रातःस्मरणीय है।
एक राष्ट्र वहां के बहुसंख्य लोगों द्वारा बनाया जाता है। जर्मनी में ज्यू अल्पसंख्यक होने की वजह से उन्हें जर्मनी से बाहर निकाला गया........जर्मनी में जर्मन लोगों का आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन है लेकिन ज्यू लोगों का आंदोलन सांप्रदायिक आंदोलन है......... राष्ट्रीयता आम भौगोलीक क्षेत्र से ज्यादा, धर्म, विचार, भाषा व सांस्कृतिक एकता पर निर्भर होती है, इसी वजह से जर्मन व ज्यू एक राष्ट्र नही माना जा सकता........ यहां भी हिंदु व मुस्लिम एक राष्ट्र नही माना जा सकता .............. भारतीय मुस्लिमों ने अपने अल्पसंख्यक स्थिति पर सब्र रखना चाहिए। उनके हकों को मान्यता देना बहुसंख्य लोगों की उदारता पर निर्भर होगा। (हिटलर के बारे में गोलवलकर व सावरकर के विचारों की साम्यता से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि रा.स्व. संघ ने किसका आदर्श सामने रखा है)
-हिंदुत्व (लेखक- वि. दा. सावरकर )

खुद को राष्ट्रप्रेम के ठेकेदार बताने वाले यह रा. स्व. संघ व उसके परिवार के लोगों ने अपने व्यवहार से व विचारों से कई बार इस देश का माहौल बिगाड़ने की कोशिश की है। क्या गोलवलकर के महाविचार और संघ की कृतियों को मद्देनजर रखते हुए इन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा नही चलना चाहिए?
अंत में..............
सोचना मनुष्य का प्राकृतिक गुणधर्म है। लेकिन वह क्या सोचता है इसका निर्णय वह परिवेश लेता है जिसमें मनुष्य पलता-बढ़ता है। यहां वह व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है जिसने दंगों के बारे में उपरोक्त विचार व्यक्त किए। महत्वपूर्ण है- वह परिवेश जिसमें इस कथन की भूमिका तैयार हुई।
दोस्तों, शायद यह सच पढ़कर बहुत सारे लोगों को तकलीफ होगी लेकिन कैंसर के फोड़े का इलाज सोफ्रामायसीन लगाकर नहीं किया जा सकता। तकलीफ तो होगी। बस सवाल यही है जो हमारे उम्मीदों में है वो उनके दिल में क्यों नही.....।
                                                             

 -विजय मधुकर अमृतकर
(यह लेख कुलदीप मिश्र के विशेष आभार के साथ)